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Wednesday, 8 November 2017

कुछ यूं तुझमे सिमट गयी हूं मैं


वो वक़्त भी तेरा, ठहराव भी तेरा,
रुमानियत के आईने में चेहरा सिर्फ़ तेरा... 
कहते है हर रात ये चाँद-तारे मुझसे,
ख़्वाबों के सफ़र में है रिश्ता बस तुझसे... 
जाने-अनजाने क्यों उलझ गयी हूं मैं,  
कुछ यूं तुझमे सिमट गयी हूं मैं... 

होश में आने की चाह नहीं,
अरमान तो तेरे होने से है... 
जुड़ के भी इस क़ायनात से छूट रही,
ज़न्नत तो तेरे रहने से है...
अनदेखी मंज़िल से मुड़ गयी हूं मैं, 
कुछ यूं तुझमे सिमट गयी हूं मैं...

बेवज़ह की ख़ामोशी, अब बातों की वज़ह ढूंढ़ रही,
कुछ चीज़े अपनी हो कर भी दूर होनी लगी है... 
अल्फ़ाज़ों का हर हर्फ़ तेरा हुआ बैठा है,
बेगानी-सी चाहत अब अपनाने लगी है... 
अब तो ख़ुद से ही बिछड़ गयी हू मैं,
कुछ यूं तुझमे सिमट गयी हूं मैं...