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Friday, 6 October 2017

अब बस याद बनकर रह गयी...


अब बस याद बनकर रह गयी...
हर पल में मुस्कुराना सीखा है तुमसे,
ज़िंदगी को खुल के जीना सीखा है तुमसे..
बचपन में जब मैं कहती थी "बाल दर्द हो रहा है" तब तुम समझ जाती थी कि सिर दर्द हो रहा है..
मेरे स्कूल ना जाने पर तुम कहती थी, "आज तो भिण्डी-पूड़ी है लंच में"..
तो वही बस छूट जाने पर कहती थी, "एक ज़गह हर रोज़ जाने से इज्ज़त कम हो जाती है"..
छत पर टहलते-टहलते पुराने गाने सुनना' किचन में खाना बनाते-बनाते मुझसे अख़बार पढ़वाना...
टीवी में सीरियल देखते-देखते; होमशॉप का चैनल लगा आये दिन कुछ-न-कुछ आर्डर करना...
मेरे हॉस्टल से फ़ोन करने पर घर आने के बारे में सुनकर कहना- "यहाँ आना सबसे पहले, क्या बना कर रखूंगी, क्या खायेगी बता ?"
हर बात अब बस याद बनकर रह गयी...

कुछ भी बातें कहनी होती थी, बिना किसी डर के तुमसे कहती थी, मन का हर बोझ तुम्हारे सामने हल्का कर लेती थी,
होंगे बहुत लोग मुझे समझाने वाले, मेरी काबिलियत पर मुझे सराहने वाले..
 बहुतों की भीड़ में भी मैं ख़ामोश रहूंगी, कुछ दिल की बातें अब दिल में ही रहेंगी क्योंकि तुम्हारी ज़गह कोई नहीं ले सकता और नाही तुम्हारी कमी पूरी कर सकता है...

जिस पल में जो मिल जाये उसे समेटना सीखा है तुमसे,
खुशियों के साथ-साथ गम को भी अपनाना सीखा है तुमसे..
तुम्हारी हर बात, हर साथ जान से भी ज़्यादा प्यारी है,
ज़िंदगी का सबसे अनमोल तोहफ़ा "गुनगुन" दिया है तुमने हमें,
अब तुम्हारी बातें और साथ बस याद बनकर रह गयी...

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