Followers

Saturday, 4 August 2018

कुछ अधूरा-सा अब पूरा होने को है...




शाख से टूटा पत्ता स्याही का मोहताज है,
अधूरे अंतरे को मुखड़े की तलाश है.. 
बेशक कई सपने पनपते है इन आंखों में,
ख्वाहिशों का जिक्र रहता है अनकही बातों में.. 
कुछ अधूरा-सा अब पूरा होने को है,
कुछ खामोशी अब गुनगुनाने को है.. 

आम किस्से है सारे इस ज़माने के,
    उस जहां के अलग ही अफ़साने है..    
फलक भी जरा-सा नज़र आता है उसके आगे,
यहां तो पावं रखने के लिए भी जमीन कम है.. 
कुछ अधूरा-सा अब पूरा होने को है,
कुछ खामोशी अब गुनगुनाने को है.. 

 बंदिशे अब दगा दे जाती है,
उलझनों का रिश्ता अब अपना-सा लगता है.. 
मुकम्मल होने को है किसी का साथ,
कश्मकश में न जाने क्यों है मेरे जज़्बात.. 
कुछ अधूरा-सा अब पूरा होने को है,
कुछ खामोशी अब गुनगुनाने को है.. 

Thursday, 26 July 2018

तुम्हारी-मेरी बातें...



आज तुम्हें देखे काफी वक्त हो गया.. आजकल बारिश हो रही, आसमान में काले बादल दिखते है.. जिसकी वजह से बहुत दिनों से तुम दिख ही नहीं रही.. अब क्या करुं ये मेरी आदत हो गई है.. कही भी रहूं बिना तुम्हें एक झलक देखे मन ही नहीं मानता.. सब पूछते है इतनी रात को छत पर क्या करने जा रही हो ? कितनी भी रात हो जाए तुम्हें देखे बिना.. तुमसे बातें किये बिना वो दिन अधूरा-सा लगता है.. सबको लगता है ये मेरी आदत है रात को सोने से पहले छत पर टहलना, हां आदत जरुर है..पर तुमसे मिलने की.. तुम्हें देखने की.. तुमसे बातें करने की.. अब लोग शायद पागल समझे.. पर ये तुम्हारी और मेरी बातें, फिर वो कुछ भी समझे क्या फर्क पड़ता है.. आज भी जब वो गाना गुनगुनाती हूं जो तुम्हारे पसंदीदा गानों में से एक हुआ करता था.. तेरे बिना जिंदगी से कोई सिकवा तो नहीं... लगता है तुम यहीं पास ही तो हो, और कहोगी स्पीकर में जरा बजाना इसको.. बातों पर धुल की परत जम गई है, पर यादें ताउम्र ताजा रहेंगी.. तुम्हें हमसब को छोड़ कर गए लम्बा अरसा होने जा रहा है.. पर आज भी मैं तुम्हें अपने करीब ही महसूस करती हूं.. कहा था ना मैनें, तुम्हारी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता..और ना वो जगह मैं किसी को दूंगी.. आज भी कई बातें मन में ही रह जाती है..मन करता है जोर से चीख कर तुम्हें अपनी हर बात बताऊं..जहां भी हो बस मेरी हर बातें सुन लो.. अब तुम्हारे इस पसंदीदा गाने का बोल ही सच लगता है.. तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन जिंदगी तो नहीं.. जिंदगी नहीं.. जिंदगी नहीं..."  

Saturday, 23 June 2018

वो खफ़ा भी है, अपना-सा भी है...



वो अनदेखा आसमां है, अनछूआ स्पर्श है,
ख़ामोश ज़ुबां पर वो शायरी का हर्फ़ है..
अनकही किस्सों का सार है,
सुलगती रेत में शीतल ब्यार है..
वो खफ़ा भी है, अपना-सा भी है...

बिना पर के भी हर सपनों की उड़ान है,
हक़ीकत से परे दिल में दबी अरमान है.. 
जिसके होने से ज़िंदगी कुछ ख़ास है,
सबसे अलग जिसका एहसास है..  
वो खफ़ा भी है, अपना-सा भी है...

वो गजलों में लिपटी हुयी किसी के दिल की आवाज़ है,
अंतरे को जो मुखड़ा दे वो उस तराने की साज़ है..
मसरूफ़ इस ज़माने में फ़ुरसत का पल है,
सुकून की ज़िंदगी का तराशा हुआ कल है..
वो खफ़ा भी है, अपना-सा भी है... 




Monday, 9 April 2018

यूं बचपन न खोता..

P.C- Saurabh Kumar

पेट की भूख ने ज़िंदगी के हर रंग दिखा दिए,
कंधो को बस्ते की जगह ज़िम्मेदारी के बोझ ने झुका दिए..
मासूम-सी हंसी के पीछे हर रोज़ नया ज़ख्म उभरता है,
दर्द के आंसू में भी इन आंखों में सपना पनपता है..
चाहत के फूल से भरा इनका जीवन का गुलदस्ता होता, 
अगर ज़माने की गलियों में यूं बचपन न खोता..

Wednesday, 17 January 2018

इंसान बनना बाकी है..


किताबी ज्ञान प्राप्त कर लेना कोई बड़ी बात नहीं होती है... दो-चार अंग्रेजी की लाइनें बोल देने से कोई बहुत बड़ा विद्यवान नहीं हो जाता है... आप एक अच्छे इंसान कभी नहीं हो सकते, जब तक की आपके पास एक अच्छा दिल न हो... जो लोगों की भावनाओं, उनके दर्द, उनकी तक़लीफो को समझें... 

रोड़ की दूसरी तरफ़ मैं अपने दोस्तों के आने का इंतज़ार कर रही थी.. मैं खड़े-खड़े इधर-उधर देख ही रही थी की मेरी नज़र एक बूढ़ी औरत पर गयी, जो हर दुकान पर जा कर भीख़ मांग रही थी... आखिर क्यों इन्हें इस उम्र में ऐसे भीख़ मांगनी पड़ रही है ?? इनके बच्चे नहीं होते या उनमें संस्कार नहीं होते कि वो अपने माता-पिता को इस तरह रोड़ पर सुबह से शाम तक भटकने के लिए छोड़ देते है कि वो इधर-उधर से भीख मांगकर अपना गुज़ारा करें... वो बच्चे इतने क़ाबिल बन गए होंगे कि अपने ही माँ-बाप को अलग कर देते है या फिर वो बिलकुल भी क़ाबिल नहीं कि जन्म देने वाले माता-पिता को दो वक़्त की रोटी अपने पैसों से कमा कर खिला सके.... 
मैं ये सोच ही रही थी कि वो बूढ़ी औरत एक दुकान पर गयी, जहां कुछ लड़के और लड़कियां खड़े हो कर बातें कर रहे थे.. वो सब स्कूल यूनिफार्म में थे... तभी एक लड़का बाईक से आया, वो औरत उसके पास भी पैसे मांगने गयी.. उस लड़के ने उसके हाथ झटक दिए और वो दुकान के सामने लगे बास की लकड़ी के सहारे जा खड़ी हो गयी... वो लड़का और उसके दोस्त उस बूढ़ी औरत पर हंसने लगे.. उनमें से एक लड़की अपनी नाक सिकुड़े खड़ी थी... सब-के-सब उसे अछूत की तरह देख रहे थे पर किसी ने इंसानियत के नाते क्यों नहीं देखा ?? वो बच्चे हाईयर स्कूल के थे... मुझे स्कूल छोड़े तीन साल हो गए, जहां तक मैं जानती हूं... दूसरों से घृणा करना, उनका अनादर करना नहीं सिखाया जाता किसी भी स्कूल में... किताबें मैं भी पढ़ती हूं, पर किसी भी क़िताब में दूसरों पर हंसना नहीं लिखा गया है... स्कूल जाना.. किताबें पढ़ना.. ये सब तो बस औपचारिकता है... सही शिक्षा और संस्कार तो कहीं से भी हासिल की जा सकती है... 

सब कहते है ज़िंदगी में ये बनो.. वो बनो.. बेशक बनो पर उससे पहले एक अच्छा इंसान बनो, क्यूंकि ज्ञान मात्र क़िताबी अक्षरों को पढ़कर नहीं आता  जब तक कि आप उसके पीछे छिपे मुख्य उद्देश्य को न समझ ले... 
      

Saturday, 6 January 2018

लम्हें में तू और तुझमें मैं..



ख़्वाब से घिरा मेरा सफ़रनामा..
यूं तेरे पहलू में मेरे हर ख़्वाहिशों का गुम हो जाना...
चमकती धूप में तेरा छाया बन जाना..
सूखे मौसम में बूंद की तरह बरस जाना...
ढूंढ़े ज़माना किसमें कौन है..
अब लम्हें में तू और तुझमें मैं...  

दुनिया की इस भीड़ में मेरे साथ चलना..  
उन्हीं भीड़ में मुझे मेरी आहट से पहचान लेना... 
वो चाँद जो ज़मीं से है दिखता ..
इसने ही बनाया तेरा-मेरा रिश्ता...
ढूंढ़े ज़माना किसमें कौन है..
अब लम्हें में तू और तुझमें मैं...  

ख़ामोशी में बात करने की वज़ह ढूंढना.. 
मेरी हल्की-सी मुस्कान के लिए तेरा हज़ारो गम चुनना... 
गम में मिली है हंसी सौगात तुझसे.. 
खुशियों की हर आगाज़ तुझसे... 
ढूंढ़े ज़माना किसमें कौन है..
अब लम्हें में तू और तुझमें मैं...