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Friday, 31 March 2017

फिर से बच्ची बना दो न पापा...



ज़िंदगी के अंजान रास्ते पर चलना मुश्किल लगता है,
ख़ामोशी से बातों को सहना भी भारी लगता है.. 
बचपन की वो दौड़,
मेरे जन्म की वो किलकारी, लौटा दो न पापा.. 
फिर से बच्ची बना दो न पापा...

देखा करती थी, हमेशा दिल की नज़र से सबकुछ,
अब वही नज़ारे कांटो की तरह चुभते है.. 
हर किसी को देख ये चेहरा मुस्कुराता था,
अब वही मुस्कराहट दिखावटी लगती है.. 
वो नाज़ुक सा दिल,
वो मासूम सा चेहरा लौटा दो न पापा..  
फिर से बच्ची बना दो न पापा...

अब हर सुबह होती है,
बीते रात के आंसुयों को समेट कर..
रोज़ का फ़लसफ़ा गुजरता ही नहीं,
दोपहर  की कड़ी धूप शाम को जला जाती है... 
वो रंगीन सुबह,
वो हसीन शाम लौटा दो न पापा..
फिर से बच्ची बना दो न पापा...

ज़हन में अब नए सपने पनपते है,
चैन से सोने के लिए आंखे तरसती है.. 
रात के बैठे, कब सुबह हो जाती है;पता ही नहीं चलता, 
 रात में नींद आती नहीं,
सुबह  सोने की फुरसत नहीं...
वो सुकून की नींद,
वो नए सपनों की ख़ुशी लौटा दो न पापा..
फिर से बच्ची बना दो न पापा...







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