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Wednesday, 8 March 2017

अनोख़े निशान...


"पाक साफ़ होते है ये अल्फ़ाज़...तभी तो बनते है अनोख़े निशान"

लम्हों की निगरानी में हमेशा रहते है मेरे अल्फ़ाज़,
स्याही से लिखे कागज़ के पन्नों पर,
यूं ही नहीं छोड़ते अपने निशान,
न जाने कब कहां कोई फ़लसफ़ा बन जाये...
खामोशियों की उस आवाज़ में,
बे मौसम उस बरसात में,
अंधेरे की उस हल्की सी रौशनी में,
हर पल ढूंढते है अपनी पहचान...
वक़्त के गुजरे गहरे समंदर,
यादों का वो लंबा सफर,
कुछ कहानियां अंदर ही अंदर,
उसे हर पल निखारती है,
पाक साफ़ ये नीली पोशाक,
उसे हर कदम पर सवारती है...
होता है इसका अनोखा बंधन,
कुछ इस तरह अपने आप में,
हर पल नए आज़माइशों की तलाश,
बनाते है इसे पल दो पल ख़ास,
हकीकत से कही ज़्यादा ख़ुबसूरत होती है इसकी कल्पना,
ज़िंदगी से कही बढ़कर होती है इसकी चाह...
सफर दर सफर लिए एक नया आगाज़,
हर कदम पर बिखरे ये अल्फ़ाज़,
कई दफ़ा उन लम्हों की आगोश में,
सच में छोड़ जाते है अनोखें निशान... 





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